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एचडीएफसी बैंक में आखिर क्या हुआ?

27 May 2026 , 01:43 PM

भारत के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक HDFC Bank को लेकर इन दिनों काफी चर्चा हो रही है। बैंक एक आंतरिक जांच (Internal Vigilance Probe) की वजह से निवेशकों और रेगुलेटर्स की नजर में आ गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (MSRDC) से जुड़े करीब ₹45 करोड़ के कथित अनियमित भुगतानों की जांच चल रही है।

इस खबर के सामने आते ही शेयर बाजार में भी असर दिखा। HDFC Bank के शेयर 2% से ज्यादा गिर गए और निवेशकों के बीच बैंक की गवर्नेंस और इंटरनल कंट्रोल्स को लेकर चिंता बढ़ गई।

आखिर मामला क्या है?

रिपोर्ट्स के अनुसार, बैंक की Audit Committee ने FY24 और FY25 के दौरान MSRDC को किए गए कुछ भुगतानों की जांच शुरू की थी। यह मामला तब और ज्यादा चर्चा में आया जब बैंक के पूर्व चेयरमैन Atanu Chakraborty ने मार्च में अचानक इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने अपने इस्तीफे में कहा था कि बैंक के भीतर कुछ ऐसी “practices” चल रही थीं जो उनके नैतिक मूल्यों से मेल नहीं खाती थीं।

बताया जा रहा है कि बैंक की इंटरनल ऑडिट टीम ने मार्केटिंग डिपार्टमेंट की जांच के दौरान कई ट्रांजैक्शन्स पर सवाल उठाए। ऑडिट रिपोर्ट में विभागीय नियंत्रणों को “unsatisfactory” बताया गया, जिसके बाद Internal Vigilance Investigation शुरू हुई।

जांच में क्या सामने आया?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, HDFC Bank ने कथित तौर पर MSRDC को जमा राशि पर सामान्य दर से ज्यादा रिटर्न देने का मौखिक वादा किया था।

जहां बैंक का सामान्य सेविंग डिपॉजिट रेट करीब 3.5% था, वहीं MSRDC को लगभग 6.01% तक प्रभावी रिटर्न देने की बात कही गई थी। शुरुआत में एक स्पेशल 4.5% डिपॉजिट विंडो दी गई, लेकिन उसके हटने के बाद बाकी रकम की भरपाई कथित तौर पर दूसरे रास्तों से की गई।

आरोप है कि यह अतिरिक्त भुगतान मार्केटिंग खर्च के रूप में दिखाए गए। इन्हें रोड सेफ्टी अवेयरनेस कैंपेन की sponsorship payments बताया गया।

यहीं पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ, क्योंकि RBI के नियमों के अनुसार बैंक किसी खास डिपॉजिटर को तय सीमा से बाहर preferential returns नहीं दे सकते।

किन अधिकारियों पर सवाल?

रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इस व्यवस्था की जानकारी कई वरिष्ठ अधिकारियों को थी। जांच में यह भी आरोप लगा कि मार्केटिंग डिपार्टमेंट ने differential interest payments को marketing expenses की तरह दिखाने में “facilitator” की भूमिका निभाई।

सूत्रों के अनुसार, 10 से ज्यादा वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है।

ऑडिट में कौन-कौन सी गड़बड़ियां मिलीं?

Internal audit में कई गंभीर लापरवाहियां सामने आईं, जैसे:

  • Vendor invoices की ठीक से जांच नहीं हुई
  • लगभग ₹9 करोड़ के कई invoices में एक ही फोटो दोबारा इस्तेमाल की गई
  • Event completion certificates नहीं मिले
  • Road safety campaign के वास्तव में होने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले
  • Standard compliance checks की कमी पाई गई

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि CSR टीम को इस पूरी प्रक्रिया से अलग रखा गया, जबकि ऐसे campaigns आमतौर पर CSR के तहत आते हैं।

RBI और गवर्नेंस पर सवाल

जांच रिपोर्ट में RBI deposit rate rules, anti-bribery policies और बैंक के internal governance norms के संभावित उल्लंघन की बात कही गई है।

हालांकि, RBI ने मार्च में सार्वजनिक रूप से कहा था कि उसे HDFC Bank की governance को लेकर कोई “material concern” नहीं दिखा। बैंक के interim chairman Keki Mistry ने भी बैंक की governance practices का बचाव किया था।

निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ एक बैंक तक सीमित नहीं है। इससे पूरे बैंकिंग सेक्टर में governance standards, compliance monitoring और audit systems पर बहस तेज हो सकती है।

निवेशकों के लिए यह एक बड़ा reminder है कि मजबूत financial performance के बावजूद governance issues किसी भी बड़ी कंपनी की market credibility को प्रभावित कर सकते हैं।

अस्वीकरण – इस लेख में उल्लेखित शेयरों और सूचकांकों (Indices) पर चर्चा केवल जानकारी और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए की गई है। इसे निवेश सलाह या किसी भी प्रतिभूति को खरीदने या बेचने की सिफारिश के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। निवेशकों को कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले स्वयं शोध करना चाहिए या अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श लेना चाहिए। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होता है। निवेश करने से पहले सभी संबंधित दस्तावेजों को ध्यानपूर्वक पढ़ें।

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